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vittala-1

ஓகஸ்ட் 23, 2015

ஸ்ரீ ஜே.கே. சிவன் அவர்கள் தமிழில் -தெவிட்டாத விட்டலா –என்று எழுதியுள்ளதிலிருந்து அவர் விரும்பிய படி ஹிந்தியில் மொழி பெயர்த்தது.

घोडेवाला:
सन्त तुकाराम के बारे में हम लोगों ने कई कहानियाँ सुना है । महाराष्ट्र के विट्ठल मन्दिर जितना प्रसिद्ध है उतना ही सन्त कवियों के सच्चरित्र और उनके कृतियाँ जिसे अभंग नाम से गाते हैं, वे भी प्रसिद्ध है। भक्ति भाव भरी इन गाथाएँ भारतीय साहित्य संसार मे एक अनोखी स्थान प्राप्त हुए हैं ।

इस महान का आश्रम एक गाँव मे वन के समीप बसा हुआ था | चारों तरफ घन जंगल – बस्ति भी बहुत ही साधारण – छत की जाल से घुसकर सूरज के किरणें फर्श पर रंगोली बना रखा था । बारिश हो तो क्या हाल होगा – अन्दर की मन्दिर नाम के एक शिथिल बस्ती ही – फ़िर भी उसमे भक्त जन उत्साह से गाते, नाच्ते थे | मूल स्थान मे भगवान विट्ठल के सुन्दर मूर्ति – जैसे सजीव थे – दोनों हाथ कमर मे किए खडे हुए अवसर में सन्त तुकाराम भजन को सुन्ते आनन्द्मग्न थे. उन सन्तों मे छत्रपति शिवाजि भी एक थे | वह भी इतर सन्तों के साथ भक्ति भाव से भावुक होकर गाते नाचते थे | तब एक सिपाही आया – भजन कर्ते लोगों के बीच चुप चाप छत्रपति के कानों मे अपना संदेश सुनाया – महराज, मुगल सैन्य आपको ढून्ढ्ते ढून्ढ्ते नजदीक आ गये – शायद आपको इधर होना उन लोगोंको मालुम हो गया हो | तुकाराम स्वामिजी, मै चल्ता हूं – शिवाजी बोले – भजन कर्ते भक्त लोगों को मेरी वजह से आपत्ति न हो – | मगर सन्त तुकाराम जी उन्हें जाने न दिया – बोले – भजन के बीच मे छोड्कर मत जा – जरा ठ्हरो – विट्ठळजी पर भरोसा रख – निश्शिन्त रहो – विटोभा के अभंग अधूरी न हो -छत्रपति शिवाजी उस सन्त के वचन को टाल न सके – मन पूर्वक भजन मे लगे रहे | सुमधुर अभंग – अगर जान देने ही पडे तो इस मधुर गाना सुनते भगवान की गोद मे हि क्यों न हो ।।

मुगल सेनापति अपने 2000 सेना वीरों के साथ उस गांव मे घुसा | किसी तरह, जिन्दा हो या मुर्दा – शिवाजी को पकड्कर लाने का आदेश लेकर तो आया है- मगर – ये क्या – अचानक शिवाजी सैन्य सहित उस सेना को चारों तरफ़ से घेर लिया – और शिवाजी अकेले तल्वार घुमाते दुश्मनों को काफ़ी नुक्सान पहुंचाया – इस मुकाबला के लिए जरा भी मुगल सेना तैयार नहीं थे | मुगल सेनापति शिवाजी को पकड्ने के उद्देश्य से जब पास मे आया तो शिवाजी किसी बहाने से उन्हें वन के भीतर दूर तक ले चले – छायाभरी जंगल – सूर्यास्तमन तक युद्ध चलता रहा – दुश्मनों के बीच ‘पहाड के चूहा’ नाम से शिवाजी जाना जाता था | पहाडी इलाके सब जगह शिवाजी को परिचय रह्ने के कारण उन्हें पक्ड्ना असंभव समझ्कर मुगल सेना लौट पडे – निराश होकर जब सुल्तान को बताया कि शिवाजी पहाड के गुफों मे अन्तर्दान हो गये – तो सुल्तान नाराज होकर उन्हें डांटा – मूंह लट्क कर वे चुप रहे – भला और क्या कर्ते |

इधर भजन समाप्त हुआ – प्रसाद बांट्ते थे – सब प्रसाद लेकर लौट्ते थे – आपस मे खुशी से बात कर जा रहे थे – वहां एक तरफ़ का कोलाहल मचा हुआ था –
एक सिपाही शिवाजी के पास आया और बोले – महराज आप की बहादुरी के सामने शत्रु सैन्य छिन्न भिन्न होकर भाग गये – आप तो इतना बडा उत्साह और धीरता से लडते थे – बिज्ली के समान आप इधर पहुंच भी गये –
छत्रपति शिवाजि निश्शब्द रह गये – आंखों मे आंसू बह्ने लगें – दोनों हाथ जोड्कर विट्ठळ को प्रणाम किया – विट्ठल मूर्ति मे बसे भगवान को धन्यवाद कह्ते रहे | मगर उन्हें तो सुल्तान के वीर पहाडों मे ऒर भी तलाश करते फिरते थे ||
बच्चों ! आप लोग समझ गये होंगे – जब शिवाजी भजन में लगे हुए थे – विट्ठल स्वयं शिवाजी बनकर लड्ने चल पडे – इस घटना से आप को मालुम हो गया होगा कि भगवान भक्त जनों को कभी भी दु:ख होने नहीं देते ||

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  1. Janakikrishnan's Blog

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