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नामदेव

ஓகஸ்ட் 27, 2015

नामदेव
उद्धवा, जरा इधर आ – क्षीरसागर से भगवान नारायण ने बुलाया । जब उद्धव वहाँ पहुँचा, भगवान ने बोला – तुमें भूलोक में एक मानव का जन्म लेना है ।
भगवन्, आपका वचन मेरे शिरोधार्य है ही, फिर भी..
फिर क्या – भगवान बोले
जैसे साधारण व्यक्ति जन्म लेता है वैसा नहीं..
भगवान् हँसते हाँ किया । वैसे ही उन्हें एक शिशु बनाया और एक पत्ते मे बिठाकर वैकुण्ठ से भीमावति नदी जल मे उतार दिया । नदी मे बहता बच्चे को एक दर्जी ने देखा । वह भी विट्ठल भक्त था, हर रोज वहाँ स्नान करने आता था । यहाँ नदी को चन्द्रभागा कहते थे । स्नान के बाद बच्चे को साथ लेकर मन्दिर में विटठलजी दर्शन करके, घर पहुँचा – पति पत्नि दोनों बडे प्यार से बच्चे को अपनाया – विधिवत् नामकरण किया – नामदेव इति । आगे चलकर वही प्रसिद्ध भक्तकवि बना । भक्त जनों के बीच यह कथा प्रचलित है कि उस दिन भगवान विटठलजी स्वयं आशीर्वाद करने आए थे – बच्चे को एक कमीस आर टोपी पहनाया था ।
नामदेव सदा सर्वदा विट्ठल ध्यान मे रहता – लौकिक चीजों पर जरा भी दिलचस्पी न रहा – यहाँ तक कि न पढता न कुछ सीखता – माँ बाप दुःखी थे कि कुछ तो सीखे विना धन कमाएगा कैसे और जीवन बिताएगा कैसे । बहुत समझाया – मगर वह सुधरा नहीं ।
नामदेव एकदिन भगवान से विनती करता- हे भगवन्, मुझे क्यों इस संसार मे छोडा – भगवान ने पूछा – क्यों क्या दुख है तुमे –
नामदेव ने बोला – माँ बाप प्यार करते हैं ही मगर सदा माँ बडबडाती है – नौकरी करो, धन कमाओ – मेरा मन तो सदा तुम्हारे पास रहने और भजन करने मे लगे रहना चाहता है ।।
पास मे माँ रुक्मिणी खडी थी – भगवान उससे कहा – देखो देवी, ये तो चाहता है हम भी उसके साथ ही रहें –अब पत्नि भी है – तो माँ क्यों नही चिन्ता करती –
इसी समय घर मे नामा की पत्नि सास से कह रही थी – माँजी आपके बेटा एक अमूल्य रत्न है – भक्तिमान और सदा भजन विट्ठल ध्यान जप करता है- मगर मुझे देखिए – फट्टी पुरानी के अलावा, न कपडे – भरपेट भोजन क्या घर मे एक दाना नही, हम सब क्या जिन्दगी बिता रहे हैं – भूखे प्यासे – माँ उससे मरना अच्छा नही है – वह रो पडी ।
माँ क्या करती – आस पास मे माँगने जा रही थी – तब मन मे एक ख्याल आया – इन लोगों से क्या माँगना –सब हमारे जैसे बाल बच्चे वाले – कितना दे सकते – विट्ठलजी से ही अपना हालत सुनाती हूँ – सीधे मन्दिर गई । नामा जब अपनी व्यथा सुनाता था ठीक वही समय ।। भगवान ने नामा को अपने पीछे चुपाकर रखा -और
माँ कोना को दर्शन दिया – जोर से रो रोकर वह बोली- विट्ठला – मेरे बेटे को समझाओ – पागल सा हमेशा भजन करने – ध्यान करने बैठ जाता – अब अकेला भी नहीं, पत्नि है, बच्चे हैं – एक बेटे के नाते, पति और पिता के नाते कर्तव्य पूरा करना चाहिए न – विट्ठला, दया कर, परिवार को दुखी करके वह क्या सुख पाना चाहता – तुम तो कुचेल को अनुग्रह करनेवाला, दरिद्रता हमे भी सताती है, द्रौपदी को बचाने भाग आया, हमारे घर हम दो औरतें दैनिक उपयोग कि कपडे के लिए तडप रहे हैं – तुम्हें दीखता नहीं – कहते कहते रो रही थी ।
विट्ठल इस माँ को क्या जवाब देगा – मुसकुराकर बोले – माँजी तुम फूल कर रही हो – तुम्हारे पास बेटा रूप मे एक अमृत कलश है – जो मनुष्य को इस संसार से पार करने वाला है –नामा मेरा भक्त होने की वजह से तुम भी मुझे देखती हो – मै तुम से बात कर रहा हूँ – निशश्चिन्त हो जा – घर लौटो – सम्भालो अपने को – और समझो कि इस अनोखी संपत्ति तुम्हें अपनी पूर्वजनम सुकृत से ही मिला ।
पास मे देविय़ाँ दोनों रुक्मिणी और सत्यभामा की और देखा और बोला – देवी आप ही बोलिए – नामा सदा विट्ठल भजन करता है – भक्त का घरवाले कैसे जीवन विता रहें है – कभी सोचा – माँ मै हूँ, पत्नी है, बच्चे है- लोक मे घर वाला हो तो सबको संभालता – अन्न वस्त्र का प्रबन्ध करता – भक्त हो तो इन सब कर्तव्य़ों उसे हाथ धोना हो तो वैसे ही सही – चलो नामा – घर चलतें हैं – विट्ठल अपने कमर पर हाथ रखते वीट पर खडा रहेगा – तुम्हें छोडकर मै नही जाऊँगी
कोना, बेटे को लेकर तुम घर जाना हो तो जाओ – हमे तक्रार न करना – रुक्मिणी बोली –
नामा के आँखों से आँसू बह रहा था – बोला कुछ नहीं –विट्ठल – कोना, तुम्हारा बेटा संसार के बन्ध पाश से मुक्ति पाना चाहता है – इसमे क्या गलत है – तुम अपने आप समझोगे -अब उसे हाथ पकडकर ले चल –
माँ बेटे घर पहूँचे तो आश्चर्य चकित रह गए – नामा की पत्नी खाना पका रही थी – बहुत सारे कपडे, धन धान्य – ये क्या – नामा की पत्नी ने कहा – कोई नामा से मिलने आए थे – ये सब दे गये थे ।।
अब माँ कोना, पत्नि राजा ही नहीँ सारे गाँवाले नामा को आदर से देखने लगे। माँ उसे गृहस्थी की चिन्ता होने नहीं दिया । नामदेव आगे चलकर कई अभंग गा रहे थे जो अब भी मशहूर है ।।

कोना ने देखा कि नामा चिन्तित था । नामा क्या बात है –
नामा ने बोला – किसी के लिए लाया होगा – हमे दे गया – कौन है , क्यों हमे देता – हमे क्या जरूरी है एसे चमकदार कपडे पहन्ने – और धौलत दिखाने का – जो वास्तव मे हमारा नही है –
राजाई ने जवाब दिया – माँ जब आप इन्हें लाने गए थे – एक सज्जन आया – इन्से मिलना चाहता था – मैने बोला आप दोनों मन्दिर गए – मुझे बहुत बुरा लगा कि घर आए अतिथि को कुछ दे न सकती – अपनी घर की हालत कह सुनाया – क्षमा कीजिए, मै आपको खाने पीने के लिए कह न सकी – आस पास मे सबसे उदार ले चुकें अब कैसे चुकाएँगे – मेरे आँखों मे आँसु बहने लगी –
आगन्तुक सज्जन ने कहा – बेटी रो मत – मुझे मालुम है – नामा के वित्त व्यवस्था अच्छा नहीं है – इसलेए ये धन देने ही आया हूँ – अपना नाम केशव दत्त कहा – सम्भालो इन चीजों को – मै मन्दिर मे ही नामा और तुम्हारी सास से मिलूँगा – कहते कहते चल पडे –
अब सबको मालुम हो गया कि केशव दत्त कौन है ।
मगर नामा नया घर नहीं अपनी पुरानी झोंपडी मे ही रहता था .

नामदेव
उद्धवा, जरा इधर आ – क्षीरसागर से भगवान नारायण ने बुलाया । जब उद्धव वहाँ पहुँचा, भगवान ने बोला – तुमें भूलोक में एक मानव का जन्म लेना है ।
भगवन्, आपका वचन मेरे शिरोधार्य है ही, फिर भी..
फिर क्या – भगवान बोले
जैसे साधारण व्यक्ति जन्म लेता है वैसा नहीं..
भगवान् हँसते हाँ किया । वैसे ही उन्हें एक शिशु बनाया और एक पत्ते मे बिठाकर वैकुण्ठ से भीमावति नदी जल मे उतार दिया । नदी मे बहता बच्चे को एक दर्जी ने देखा । वह भी विट्ठल भक्त था, हर रोज वहाँ स्नान करने आता था । यहाँ नदी को चन्द्रभागा कहते थे । स्नान के बाद बच्चे को साथ लेकर मन्दिर में विटठलजी दर्शन करके, घर पहुँचा – पति पत्नि दोनों बडे प्यार से बच्चे को अपनाया – विधिवत् नामकरण किया – नामदेव इति । आगे चलकर वही प्रसिद्ध भक्तकवि बना । भक्त जनों के बीच यह कथा प्रचलित है कि उस दिन भगवान विटठलजी स्वयं आशीर्वाद करने आए थे – बच्चे को एक कमीस आर टोपी पहनाया था ।
नामदेव सदा सर्वदा विट्ठल ध्यान मे रहता – लौकिक चीजों पर जरा भी दिलचस्पी न रहा – यहाँ तक कि न पढता न कुछ सीखता – माँ बाप दुःखी थे कि कुछ तो सीखे विना धन कमाएगा कैसे और जीवन बिताएगा कैसे । बहुत समझाया – मगर वह सुधरा नहीं ।
नामदेव एकदिन भगवान से विनती करता- हे भगवन्, मुझे क्यों इस संसार मे छोडा – भगवान ने पूछा – क्यों क्या दुख है तुमे –
नामदेव ने बोला – माँ बाप प्यार करते हैं ही मगर सदा माँ बडबडाती है – नौकरी करो, धन कमाओ – मेरा मन तो सदा तुम्हारे पास रहने और भजन करने मे लगे रहना चाहता है ।।
पास मे माँ रुक्मिणी खडी थी – भगवान उससे कहा – देखो देवी, ये तो चाहता है हम भी उसके साथ ही रहें –अब पत्नि भी है – तो माँ क्यों नही चिन्ता करती –
इसी समय घर मे नामा की पत्नि सास से कह रही थी – माँजी आपके बेटा एक अमूल्य रत्न है – भक्तिमान और सदा भजन विट्ठल ध्यान जप करता है- मगर मुझे देखिए – फट्टी पुरानी के अलावा, न कपडे – भरपेट भोजन क्या घर मे एक दाना नही, हम सब क्या जिन्दगी बिता रहे हैं – भूखे प्यासे – माँ उससे मरना अच्छा नही है – वह रो पडी ।
माँ क्या करती – आस पास मे माँगने जा रही थी – तब मन मे एक ख्याल आया – इन लोगों से क्या माँगना –सब हमारे जैसे बाल बच्चे वाले – कितना दे सकते – विट्ठलजी से ही अपना हालत सुनाती हूँ – सीधे मन्दिर गई । नामा जब अपनी व्यथा सुनाता था ठीक वही समय ।। भगवान ने नामा को अपने पीछे चुपाकर रखा -और
माँ कोना को दर्शन दिया – जोर से रो रोकर वह बोली- विट्ठला – मेरे बेटे को समझाओ – पागल सा हमेशा भजन करने – ध्यान करने बैठ जाता – अब अकेला भी नहीं, पत्नि है, बच्चे हैं – एक बेटे के नाते, पति और पिता के नाते कर्तव्य पूरा करना चाहिए न – विट्ठला, दया कर, परिवार को दुखी करके वह क्या सुख पाना चाहता – तुम तो कुचेल को अनुग्रह करनेवाला, दरिद्रता हमे भी सताती है, द्रौपदी को बचाने भाग आया, हमारे घर हम दो औरतें दैनिक उपयोग कि कपडे के लिए तडप रहे हैं – तुम्हें दीखता नहीं – कहते कहते रो रही थी ।
विट्ठल इस माँ को क्या जवाब देगा – मुसकुराकर बोले – माँजी तुम फूल कर रही हो – तुम्हारे पास बेटा रूप मे एक अमृत कलश है – जो मनुष्य को इस संसार से पार करने वाला है –नामा मेरा भक्त होने की वजह से तुम भी मुझे देखती हो – मै तुम से बात कर रहा हूँ – निशश्चिन्त हो जा – घर लौटो – सम्भालो अपने को – और समझो कि इस अनोखी संपत्ति तुम्हें अपनी पूर्वजनम सुकृत से ही मिला ।
पास मे देविय़ाँ दोनों रुक्मिणी और सत्यभामा की और देखा और बोला – देवी आप ही बोलिए – नामा सदा विट्ठल भजन करता है – भक्त का घरवाले कैसे जीवन विता रहें है – कभी सोचा – माँ मै हूँ, पत्नी है, बच्चे है- लोक मे घर वाला हो तो सबको संभालता – अन्न वस्त्र का प्रबन्ध करता – भक्त हो तो इन सब कर्तव्य़ों उसे हाथ धोना हो तो वैसे ही सही – चलो नामा – घर चलतें हैं – विट्ठल अपने कमर पर हाथ रखते वीट पर खडा रहेगा – तुम्हें छोडकर मै नही जाऊँगी
कोना, बेटे को लेकर तुम घर जाना हो तो जाओ – हमे तक्रार न करना – रुक्मिणी बोली –
नामा के आँखों से आँसू बह रहा था – बोला कुछ नहीं –विट्ठल – कोना, तुम्हारा बेटा संसार के बन्ध पाश से मुक्ति पाना चाहता है – इसमे क्या गलत है – तुम अपने आप समझोगे -अब उसे हाथ पकडकर ले चल –
माँ बेटे घर पहूँचे तो आश्चर्य चकित रह गए – नामा की पत्नी खाना पका रही थी – बहुत सारे कपडे, धन धान्य – ये क्या – नामा की पत्नी ने कहा – कोई नामा से मिलने आए थे – ये सब दे गये थे ।।
अब माँ कोना, पत्नि राजा ही नहीँ सारे गाँवाले नामा को आदर से देखने लगे। माँ उसे गृहस्थी की चिन्ता होने नहीं दिया । नामदेव आगे चलकर कई अभंग गा रहे थे जो अब भी मशहूर है ।।

 

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